तिरंगा का पांचवां रंग

#तिरंगा का #पांचवां रंग

कक्षा में मास्टर जी ने पूछा-
“बच्चों, बताओ तो भारत के राष्ट्रीय ध्वज में कितने रंग है ?”

“तीन”। सारे बच्चों के स्वर कक्षा में एक साथ गूंजा।

शोर थमने के बाद एक सहमा-सा बच्चा धीरे धीरे खड़ा होकर विनम्र स्वर में बोला,

“मास्टर जी, पांच”।

सारे बच्चे यह सुन कर हँसने लगे।

मास्टर जी अपने गुस्से को दबाने की कोशिश करते हुए बोले :

“चलिए, आप ही सबको बता दीजिए कौन कौन से पाँच रंग है हमारे तिरंगे में”?

तिरंगे के नाम सुनने के बाद भी बच्चा धीरे धीरे बोलने लगा-“सबसे उपर केसरिया, उसके नीचे सफेद, सबसे नीचे हरा और बीच में एक चक्र जिसका रंग नीला है।”

मास्टर जी ने अपने हाथ दायें-बायें हिलाते हुए हल्के से ऊंची आवाज में पूछा-

“फिर भी तो चार ही हुआ। ये पांचवां रंग कौन सा है?”

मासूम बच्चे ने आंख झुकाए सरलता से उत्तर दिया-“वो है पूरे ध्वज में फैला हुआ लाल-लाल धब्बा, मुझे याद है मास्टर जी, जब मैंने पापा को अंतिम बार देखा था”

घर के आंगन में एक ताबूत के अंदर पापा एक वैसे ही ध्वज को ओढ़ कर सोये हुए थे।”

कक्षा का शोर अचानक थम सा गया। मास्टर जी का गुस्सा गायब हो चुका था। गला भर आया था। कुछ बोल नहीं पाये।

सिर्फ हाथ के इशारे से सबको शाँत बैठने को कह कर सर झुकाए कक्षा के बाहर निकल आए और भीगी आँखों से आसमान के तरफ़ देखते हुए सोंचने लगे-

“तिरंगे में लगे खून के उन लाल धब्बों को हम कैसे भूल गए?

कबीर कहते हैं:

*कबीर कहते हैं:*
*”आतम अनुभव ग्यान की, जो कोई पूछै बात।*
*सो गूंगा गुड़ खाइके, कहै कौन मुख स्वाद।।’*

और बड़ी कठिनाई यह है कि जिसने जान लिया है, वह भी तुम्हें देना चाहे तो नहीं दे सकता।
तुम्हें ज्ञानियों की पीड़ा का कोई भी पता नहीं; तुम एक ही पीड़ा जानते हो..अज्ञानी की।
ज्ञानी की पीड़ा यह है कि उसे पता चल गया है, वह जानता है, और तुम्हें देखता है भटकता हुआ और चाहता है कि तुम्हें सब दे दे, लेकिन कोई उपाय नहीं है।

‘सो गूंगा गुड़ खाईके, कहै कौन मुख स्वाद।’
वह गूंगे की भांति हो गया है। गुड़ तो चख लिया है; तुम्हें देख रहा है कि तुम भी गुड़ की तलाश में भटक रहे हो।
तुम्हें देख रहा है कि तुम गिरते हो जीवन में दुख पाते हो, पीड़ा है, कष्ट है, संताप है; तुम्हें भी स्वाद मिल जाये तो तुम्हारा भी स्वर्ग का द्वार खुल जाये। वह चाहता है कि तुम्हें सहारा दे।
वह चिल्ला कर तुम्हें कह देना चाहता है..बड़ा मीठा है।
लेकिन जैसे गूंगा नहीं चिल्ला पाता..कंठ अवरुद्ध है, ओंठ बोलते नहीं..वैसे ही ज्ञानी भी कठिनाई में अपने को पाता है। वह गूंगे से भी बड़ी कठिनाई है। क्योंकि गूंगे का तो कोई इलाज हो सकता है; ज्ञानी का कोई इलाज नहीं हो सकता।

क्योंकि वह कठिनाई न बोलने की है; शारीरिक कठिनाई नहीं है।
शारीरिक कठिनाई होती तो इलाज हो सकता था। वह कठिनाई तो आत्मज्ञान के अनुभव के स्वभाव की है।
वह ज्ञान ही ऐसा है कि कहा नहीं जा सकता। तुम भी जान लो तो ही तुम पहचान सकोगे। और अगर ज्ञानी कहने की चेष्टाएं भी करे तो सब चेष्टाएं असफल हो जाती हैं; न केवल असफल हो जाती हैं, बल्कि दुष्परिणाम लाती हैं।

क्योंकि वह कहता कुछ और है, कहा कुछ और जाता है;
कहना वह कुछ और चाहता था, शब्द कुछ और ले जाते हैं;
पहुंचाना कुछ और चाहता था, जब तुम्हारी तरफ देखता है तो देखता है कि कुछ और पहुंच गया। तुमने कुछ और ही समझ लिया।

इसीलिए तो इतने संप्रदाय खड़े हुए हैं।

ज्ञानियों ने कहा था धर्म, बन गये संप्रदाय।
ज्ञानियों ने जो कहा था, वह पहुंचा ही नहीं। तुम तक पहुंचते-पहुंचते ही झूठ हो जाता है सत्य।
तुम जैसे ही सुनते हो,
तुम उसमें संयुक्त हो जाते हो।
तुम्हारा मन व्याख्याएं शुरू कर देता है।
तुम अपने अर्थ रोप देते हो।
तुम वही अर्थ कर लेते हो जो तुम करना चाहते हो। धर्म और संप्रदाय में यही भेद है।

ज्ञानी तो चेष्टा करता है धर्म को तुम तक पहुंचाने की; जो पहुंचता है वह संप्रदाय है।
ज्ञानी तो चाहता था, तुम्हें मुक्त कर दे; जो घटना घटती है वह यह कि तुम और बंध जाते हो।
एक और उपद्रव शुरू हो जाता है।
ज्ञानी तो चाहता था कि तुम्हारे जीवन में प्रेम का आविर्भाव हो; लेकिन जब तुम्हारी तरफ देखता है तो पाता है कि तुम प्रेम के नाम पर ही युद्ध करने को तैयार खड़े हो।

सुपात्रों को दान देने से ही दानकर्ता को जन्म-जन्मान्तर में अच्छे परिणाम मिलते हैं’

ओ३म्
‘सुपात्रों को दान देने से ही दानकर्ता को जन्म-जन्मान्तर में अच्छे परिणाम मिलते हैं’
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हमारे शास्त्रों में दान की महिमा बताई गई है। मनुष्यों को अपना भविष्य सुधारने के लिये सुपात्रों को अवश्य दान करना चाहिये। यज्ञ के तीन अंग कहे जा सकते हैं। पहला देवपूजा, दूसरा संगतिकरण और तीसरा दान। यज्ञ में जड़ व चेतन दोनों प्रकार के देवताओं का यजन, पूजा, सत्कार व संगतिकरण होने के साथ दान भी होता है। यज्ञ में विद्वानों के सम्मान व प्रवचन होने से देवपूजा व संगतिकरण प्रत्यक्ष रूप में होता है। यदि यज्ञ से दान की बात पर विचार करें तो हम यज्ञ में जो यज्ञकुण्ड, समिधा, घृत, ओषधियों आदि सुगन्ध उत्पन्न करने व रोग नाशक एवं अन्य अनेक लाभों को देने वाली वस्तुओं को आहुतियों के रूप में देते हैं उनसे वायु के दुर्गन्ध नाश और रोगनाशक प्रभाव से अनेक मनुष्यों व वायुस्थ प्राणियों को लाभ मिलता है। यज्ञ की सामग्री, समय और धन का जो व्यय हम यज्ञ करने के लिए करते हैं वह दान कहा जा सकता है। दान की परिभाषा ही यह है कि सत्पात्रों को लाभ पहुंचाना जिससे हमारा परिवार, समाज व देश अज्ञान, अत्याचार, अन्याय, अभाव आदि से मुक्त हो सके। हमें दान करते हुए इन बातों पर अवश्य ध्यान देना चाहिये। यदि हम किसी ऐसे स्थान व व्यक्ति को दान देने हैं कि जहां दान का सदुपयोग व सामान्यजनों सहित समाज व देश का कल्याण न होता हो तो वह दान नहीं अपितु एक ऐसा कर्म है जिसके परिणामस्वरूप ईश्वर हमें दुःख भी दे सकता है। आज समाज में इतने धर्म गुरु व मत-मतान्तर उत्पन्न हो गये हैं जो अपने बड़े-बड़े भवन व सुख सुविधायें उत्पन्न करने सहित अपने अन्धभक्तों की संख्या में वृद्धि कर रहे हैं। किसी को पता नहीं चलता कि यह किससे कितना धन दक्षिणा के रूप में लेते हैं व उसका व्यय किन अच्छे व बुरे कार्यों में करते हैं? जनता से दान लेने वाली सभी संस्थाओं को चाहे वह आर्यसमाज ही क्यों न हो, दानदाता को अपने समस्त क्रियाकलापों सहित आयव्यय एवं अपनी सम्पत्तियों का विवरण देना चाहिये। ऋषि दयानन्द जी के जीवन में एक प्रसंग आता है कि जब उन्होंने मुरादाबाद के एक पौराणिक संस्कृत व उर्दू विद्वान द्वारा सनातन वैदिक धर्म द्वेषी लोगों द्वारा आर्य हिन्दुओं के विरुद्ध उनके निन्दात्मक ग्रन्थ के खण्डन में ग्रन्थ लिखने पर मुकदमा चलाया गया था। ऋषि के ज्ञान में यह बात आई तो उन्होंने अपने भक्तों से उस बन्धु की आर्थिक सहायता कराई और उन्हें देष मुक्त कराया था। उस हिन्दू पंडित को आर्य लोगों से जो सीधी धनराशि पहुंची थी, उन्होंने उसका हिसाब नहीं दिया तो स्वामी जी ने प्राप्त व व्यय की धनराशि का विवरण देने के अनेक अवसर दिये। इस बात से उसके विरोधी हो जाने व स्वामी जी ने उसी स्वार्थ भावना की आलोचना कर उससे सम्बन्ध विच्छेद कर लिये थे। ऐसा ही उन्होंने अपने कुछ कर्मचारियों के अर्थ शुचिता विरोधी कार्यों के कारण उन्हें भी हटा दिया था। इससे यह ज्ञात होता है कि जनता का धन अच्छे व जनता के हित के कार्यों में ही व्यय होना चाहिये और जनता को उसका हिसाब व आय-व्यय सूचित किया जाना चाहिये जो वर्तमान में हमारी सभी संस्थायें नहीं कर पा रही हैं।

दान का उद्देश्य वैदिक धर्म व संस्कृति की रक्षा का मुख्य होना चाहिये। इसका कारण है कि वेद व ऋषियों के उपनिषद व दर्शन आदि ग्रन्थों में ही ईश्वर का सत्यस्वरूप, उसकी उपासना कर उसका प्रत्यक्ष व साक्षात्कार करने की विद्या व विधि, यज्ञ का स्वरूप व उसकी विधि तथा मनुष्यों के जन्म से मृत्यु पर्यन्त समस्त सत्य कर्तव्यों व परम्पराओं का विधान है। इसकी अवश्य रक्षा होनी चाहिये नहीं तो मानव मानव नहीं रहेगा। वस्तुतः श्रेष्ठ मानव बनता ही तब है जब वह वेद व वैदिक साहित्य का अध्ययन करें और उस पर शत प्रतिशत आचरण करें। यदि वह जानता तो सब कुछ है परन्तु उसके अनुरूप करता नहीं है तो उसका वह ज्ञान लाभकारी नहीं होता। ऋषि दयानन्द के जीवन पर दृष्टि डाले तो हम पाते हैं कि उन्होंने अपने जीवन मे अध्ययन व अनुसंधान करते हुए वेद के सत्य अर्थों को जाना जो उनके समय में किसी भी विद्वान को उपलब्ध नहीं थे। उन्होंने वेदों की शिक्षाओं का आचरण स्वयं भी किया व दूसरों से कराने का भी प्रशंसनीय उद्यम किया। विश्व के सभी लोगों का सर्वांगपूर्ण हित करने के उन्होंने व्याख्यान व लेखन के द्वारा वैदिक सिद्धान्तों का प्रचार-प्रसार किया तथा इस कार्य के लिये आर्यसमाज की स्थापना भी की। आज उसी के प्रभाव से देश में अज्ञानता, अन्धविश्वास, कुरीतियां, असमानता आदि कम हुए व दूर हुएं हैं। उनके सिद्धान्तों से ही देश व विश्व से इन्हें पूरी तरह से मुक्त किया जा सकता है।

जीवन में सबसे अधिक महत्व ज्ञान का है। ज्ञान दो प्रकार का कह सकते हैं। एक आध्यात्मिक एवं दूसरा भौतिक ज्ञान। भौतिक ज्ञान की तो हमारे विश्व के वैज्ञानिकों ने पराकाष्ठा कर दी है जिसके लिये वह धन्यवाद के पात्र है।

आध्यात्मिक ज्ञान के विषय में निष्पक्ष रूप से कहें तो यह निर्दोष ज्ञान आर्यसमाज व उनके विद्वानों के ही पास है। विश्व में वेद व वैदिक ग्रन्थों का सम्पूर्णता से सत्य ज्ञान नहीं है। जो है वह विषमिश्रित अन्न के समान दूषित व हानिकारक है। अन्य मत-मतान्तरों, स्वदेशी व विदेशी, किसी के पास सत्य वेद ज्ञान को प्राप्त करने के साधन ही नहीं हैं। हमारे पुराणी बन्धुओं ने तो वेदों से दूरी ही बना रखी है। वह उसका व उसके सत्य अर्था का अनुसंधान करते हुए नहीं दीखते। आर्यसमाज ही यह कार्य करता है और अपने गुरुकुलों को आर्ष शिक्षा प्रणाली, अष्टाध्यायी-महाभाष्य-निरुक्त-निघण्टु-उणादिकोष आदि की सहायता से सभी वेद मन्त्रों के सत्य अर्थों को प्रकाशित व सामान्य जनता तक सरल हिन्दी भाषा में संप्रेषित करता है। इस प्रकरण में हम आर्यसमाज के दो प्रकाशकों श्री प्रभाकरदेव आर्य, हिण्डोन सिटी तथा श्री अजय आर्य, दिल्ली का भी उल्लेख कर धन्यवाद करना चाहते हैं जिन्होंने प्रायः सभी प्रकार के प्राचीन व अर्वाचीन वेदानुकूल ग्रन्थों का प्रकाशन करके देश व विश्व की वेद प्रेमी जनता का उपकार किया है।

विश्व में आर्यसमाज के आर्ष प्रणाली पर संचालित गुरुकुल ही वैदिक शिक्षा का अध्ययन कराकर वेदों व वैदिक साहित्य के विद्वान तैयार कर रहे हैं जिनसे हमारा सनातन वैदिक धर्म व संस्कृति सुरक्षित है। सबसे पुण्य का कार्य इन संस्थाओं की आवश्यकता पूर्ति हेतु दान करके ही किया जा सकता है। महाराज मनु ने भी ईश्वर व वेद के प्रचार व प्रसार में दिया जाने वाला दान ही सबसे श्रेष्ठ दान माना है। जिस बन्धु को भी दान करना हो वह देश के सभी गुरुकुलों की सूची प्राप्त कर जो सबसे अधिक अभाव ग्रस्त हो और जहां वैदिक शिक्षा का स्तर अच्छा हो, वहां दान देना चाहिये। इसके साथ ही हमें अपने आसपास के निर्धन, रोगी, अभावग्रस्त, असहाय, कृपण, निर्बल लोगों की भी आर्थिक सहित वस्त्र व अन्न आदि से सहायता करनी चाहिये जिससे वह भी अपने जीवन में सुख के कुछ पल अनुभव कर सकें। ऐसा करेंगे तो इसका लाभ इस जन्म में व परजन्म में भी अवश्य होगा इसकी गारण्टी है। यदि अविद्या व मत-मतान्तरों व तथाकथित वेद विद्या विहिन गुरुओं के दुष्चक्र में फंसकर ऐसा नहीं कर पाये तो इससे होने वाले जन्म-जन्मान्तरों के सुख से भी वंचित हो जायेंगे। यह भी उल्लेख कर दें कि अपने जीवन को वर्तमान व परजन्म में भी सुखी बनाने के लिये हमें भ्रष्ट आचरण से बचना चाहिये। हमारा एक भी कर्म यदि खराब हो गया तो उसका परिणाम इस सम्पूर्ण जीवन व परजन्मों में भोगना पड़ सकता है। इस पर ध्यान देने व विचार करने की आवश्यकता है।

हम प्रसंगान्तर जाकर एक बात यह भी कहना चाहते हैं कि आर्यसमाज में अपनी आय का शतांश सदस्यता शुल्क के रूप में देने का विधान है। यह सबको दान में देना चाहिये परन्तु इसके साथ ही यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि वहां गुटबाजी न हो। सभी अधिकारी व सदस्य प्रेमपूर्वक सदस्य की योग्यता के अनुसार शान्तिपूर्वक निर्वाचन सम्पन्न करते-कराते हों और सभी एक दूसरे को सहयोग देते हों। दूसरी बात यह भी कहनी है कि सभी आर्यसमाजों में एक अतिथि निवास अवश्य होना चाहिये जहां न्यूनतम शुल्क पर अतिथियों को आवास की सुविधा देनी चाहिये। केवल सरकारी पहचान पत्र के आधार पर निवास करने की सुविधा देनी चाहिये। सभी समाजों में एक रसोईयां भी होना चाहिये जो चाय, काफी, प्रातराश, दिन व रात्रि का भोजन बनाये। हमें आज के युग में किसी आर्य बन्धु के दूरस्थ स्थानों पर जाने पर वहां के आर्यसमाज के अधिकारियों द्वारा उसका अपने समाज के अधिकारियों का अनुमति पत्र मांगना अनुचित लगता है। जो ऐसा करते हैं वहां दान देने से पहले अवश्य सोचना चाहिये। इसका कारण है कि आज हमारे आर्यबन्धु ही आर्यसमाजों में नहीं जाते। वह होटल में रहते हैं जहां उन्हें आवास, भोजन व शौच आदि की उपयुक्त सुविधायें मिलती हैं। हम कुछ वर्ष पूर्व अपने पूरे परिवार के साथ अंडमान से लौटते हुए कलकत्ता के एक आर्यसमाज में गये। पहले तो जान पहचान होने पर भी वह हमें स्थान नहीं दे रहे थे। वहां के प्रमुख अधिकारियों से निकट संबंध होने के कारण स्थान दिया गया। कमरे में एक ही बैड था जिस पर हम पांच लोगों ने शयन किया। चादर पर धूल थी और कमरे मकड़ी के जाले लग थे। चूहे भी इधर उधर दौड़ रहे थे। शौचालय पुरानी पद्धति का बना था जिसमें लाइट भी नहीं थी। दुर्गन्ध इतनी की उसमें बैठ ही नहीं सकते थे। अभी बैठे ही थे कि वहां के पुरोहित जी आ गये कि रसीद कटवाईये। उन्होंने जो मांगा हमने दे दिया परन्तु हम व हमारे परिवार के सदस्य उनके व्यवहार व वहां की व्यवस्था से सन्तुष्ट नहीं हुए। हम अनुभव करते हैं कि आर्यसमाज की अधिकांश संस्थाओं में इसी प्रकार की व्यवस्था है। यह आर्यसमाज के प्रचार में साधक नहीं अपितु बाधक है। हमें सिखों से इस विषय में मार्ग दर्शन लेना चाहिये। इससे पूर्व हम पं. सत्पाल पथिक जी का पटना के एक गुरुद्

वारे का संस्मरण प्रस्तुत कर चुके हैं जहां रात्रि देर से पहुंचे पर पूरी स्पेशल ट्रेन के यात्रियों को भोजन व निवास की सुविधा दी गई थी। क्या आर्यसमाज ऐसा नहीं कर सकता? क्या इस परिप्रेक्ष्य में आर्यसमाज को श्रेष्ठ समाज कह सकते हैं?

हमने दान के बारे में संक्षिप्त चर्चा की है। हमारी कुछ बातें हमारे कुछ मित्रों को बुरी भी लग सकती हैं। हमने अपने विचारों को जो हमारे मन में उठे और जो आर्यसमाज के लिए हितकर हैं, प्रस्तुत किया है। हमारे पास इन बातों को कहने का दूसरा कोई मंच भी नहीं है। अतः जिसी किसी को कुछ बुरा लगे तो हम उससे क्षमा चाहते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

परिक्रमा का महत्त्व एवं नियम

परिक्रमा का महत्त्व एवं नियम
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परिक्रमा हिन्दू धर्म की एक महत्वपूर्ण क्रिया है। नवग्रह सूर्य की और सूर्य भी महासूर्य की परिक्रमा करते हैं। जब कार्तिकेय और गणेश में प्रतिस्पर्धा हुई थी तो कार्तिकेय ने पृथ्वी की और गणेश ने शिव-पार्वती की सात-सात परिक्रमाएँ की थी। कदाचित परिक्रमाओं का चलन उसी समय से प्रारम्भ हुआ। ऋग्वेद के अनुसार प्रदक्षिणा शब्द को दो भागों (प्रा + दक्षिणा) में विभाजित किया गया है। इस शब्द में मौजूद प्रा से तात्पर्य है आगे बढ़ना और दक्षिणा मतलब चार दिशाओं में से एक दक्षिण की दिशा। यानी कि ऋग्वेद के अनुसार परिक्रमा का अर्थ है दक्षिण दिशा की ओर बढ़ते हुए देवी-देवता की उपासना करना। सरल शब्दों में कहा जाये तो घडी की सुइयों की दिशा में आगे बढ़ना।

प्रुमख परिक्रमाएँ:
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देवमंदिर और मूर्ति परिक्रमा
नदी परिक्रमा
पर्वत परिक्रमा
वृक्ष परिक्रमा
तीर्थ परिक्रमा
चार धाम परिक्रमा
भरत खण्ड परिक्रमा
विवाह परिक्रमा

परिक्रमा के नियम:
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परिक्रमा केवल दक्षिण दिशा की ओर यानि घडी की सुइयों के जैसे करें।
परिक्रमा केवल नंगे पैर करें।
एक बार परिक्रमा शुरू करें तो समाप्ति पर ही रुकें, बीच में नहीं।
अगर स्नान कर अथवा गीले शरीर में परिक्रमा करें तो अति उत्तम है।
परिक्रमा करते समय कदापि बात-चीत ना करें।
जिस देवता की परिक्रमा कर रहे हों, अगर उनके मन्त्रों का जाप साथ-साथ करें तो अति उत्तम है।
परिक्रमा करते समय अगर हाथ में रुद्राक्ष की माला हो तो बहुत शुभ होता है।
परिक्रमा हमेशा देवता के मुख से शुरू करनी चाहिए।
जहाँ से आरम्भ किया हो, परिक्रमा का अंत भी उसी जगह करना चाहिए। अधूरी परिक्रमा का फल नहीं प्राप्त होता है।
शिवजी की परिक्रमा में विशेष ध्यान रखें। केवल उन्ही की आधी परिक्रमा की जाती है।

किस देवता की कितनी परिक्रमा करनी चाहिए:
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कर्म लोचन नामक ग्रंथ में लिखा गया है:

एका चण्ड्या रवे: सप्त तिस्र: कार्या विनायके।
हरेश्चतस्र: कर्तव्या: शिवस्यार्धप्रदक्षिणा।।

अर्थात दुर्गाजी की एक, सूर्य की सात, गणेशजी की तीन, विष्णु भगवान की चार एवं शिवजी की आधी प्रदक्षिणा करनी चाहिए। अन्य देवताओं के बारे में भी परिक्रमा के विषय में अलग-अलग मत हैं।

भगवान शिव: आधी परिक्रमा, क्यूंकि महादेव के अभिषेक की धारा को लांघना अशुभ माना गया है। शिवलिंग पर चढ़ाये जल की धारा जहाँ से निकल रही हो, वही से वापस लौट जाना चाहिए। उसे कदापि ना लांघें।

भगवान विष्णु: चार परिक्रमा। इसके अतिरिक्त भगवान विष्णु के किसी भी अवतार की चार परिक्रमा करने का विधान है।
शक्ति: दुर्गा, पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती या शक्ति के कोई भी अन्य रूप की एक परिक्रमा करने का विधान है।

हनुमानजी: तीन परिक्रमा
श्रीगणेश: तीन परिक्रमा
सूर्यदेव: सात परिक्रमा
श्रीकृष्ण: चार परिक्रमा
शनिदेव: सात परिक्रमा
श्रीराम: चार परिक्रमा
भैरव: तीन परिक्रमा

इसके अतिरिक्त पीपल एवं वटवृक्ष की सात अथवा १०८ परिक्रमाएं करना चाहिए। जिन देवताओं की प्रदक्षिणा का विधान नही प्राप्त होता है, उनकी तीन प्रदक्षिणा की जा सकती है।

जब दुर्योधन ने कृष्ण को वो तीन गलतियाँ बताई जिसके कारण उसकी पराजय हुई

जब दुर्योधन ने कृष्ण को वो तीन गलतियाँ बताई जिसके कारण उसकी पराजय हुई
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महाभारत सागर की तरह विशाल है। इसके अंदर कथाओं के ऐसे-ऐसे मोती छिपे हैं जिसे ढूँढना कठिन है। कुछ प्रसंग व्यास रचित महाभारत में है तो कुछ शताब्दियों से लोक कथाओं के रूप में सुनी और सुनाई जाती रही है। ऐसा ही एक प्रसंग हम आज आपके लिए ले कर आए हैं। ये घटना तब की है जब भीम ने दुर्योधन की जंघा तोड़ी और वो अपनी अंतिम साँसें ले रहा था। इतनी भीषण शत्रुता होने के बाद भी दुर्योधन की ऐसी मृत्यु देख कर सभी द्रवित हो गए और उसके आस-पास जमा हो गए। दुर्योधन ने अपनी चारो ओर शत्रुओं को देखा किन्तु अब बहुत देर हो चुकी थी। तभी उसने श्रीकृष्ण को अपनी तीन अँगुलियों से इशारा किया। कोई भी उसके इस संकेत को समझ नहीं पाया। तब श्रीकृष्ण ने पांडवों से कहा कि शायद दुर्योधन अपने अंतिम समय में उनसे कुछ कहना चाहता है। वे दुर्योधन के पास गए और उससे उस संकेत का अर्थ पूछा। तब दुर्योधन ने कराहते हुए कहा – “हे मदुसूदन! भीम और अन्य पांडव इस बात पर प्रसन्न हो रहे हैं कि उन्होंने मुझे पराजित कर दिया किन्तु उन्हें ये ज्ञात नहीं है कि ये पराजय मेरी स्वयं की भूल का परिणाम है। मैंने इस युद्ध में कई गलतियाँ की है किन्तु तीन ऐसी गलतियाँ है जिसके कारण मैं ये युद्ध हरा। अगर मैंने वो तीन गलतियाँ ना की होती तो तुम्हारा मुझे परास्त करना असंभव हो जाता। श्रीकृष्ण के पूछने पर दुर्योधन ने उन तीन गलतियों के बारे में बताया:

श्रीकृष्ण के स्थान पर नारायणी सेना का चयन: दुर्योधन ने बताया कि उसने श्रीकृष्ण के बदले उनकी नारायणी सेना को चुन कर सबसे बड़ी भूल की। उसके अनुसार वो भी श्रीकृष्ण को चुनना चाहता था और यदि उसे पहले अवसर मिलता तो उन्हें ही चुनता। किन्तु जब अर्जुन ने श्रीकृष्ण को चुन लिया तो इतनी बड़ी नारायणी सेना अपनी पक्ष में आता देख कर उसने प्रतिवाद नहीं किया। आज अगर श्रीकृष्ण उसकी ओर होते तो निश्चय ही विजय उसकी होती। यही नहीं महाबली बलराम ने भी ये कह कर युद्ध करने से मना कर दिया था कि वे स्वयं अपने ही भाई के विरुद्ध युद्ध नहीं कर सकते। यदि कृष्ण उसके पक्ष में होते तो बलराम भी अवश्य उसका साथ देते और फिर उन्हें भला कौन हरा सकता था?

अपनी माता के समक्ष निर्वस्त्र ना जाना: दूसरी गलती दुर्योधन ने ये बताई कि उसकी माता गांधारी ने स्पष्ट शब्दों में उसे कहा था कि वो पूर्ण निर्वस्त्र होकर उनके सामने आये किन्तु श्रीकृष्ण की बातों में आकर उसने मारे लज्जा के अपना कटिभाग केले के पत्ते से छुपा लिया। अगर उसने ये गलती ना की होती तो आज उसका सम्पूर्ण शरीर वज्र का होता और फिर भीम उसे कभी भी पराजित नहीं कर सकता था।

युद्ध में सबसे अंत में उतरना: दुर्योधन के विचार में उसकी तीसरी गलती ये थी कि वो इस युद्ध में अंत में उतरा। वो अपने सेनापतियों पर इतना निर्भर रहा कि कभी उसने स्वयं युद्ध का सञ्चालन नहीं किया। सर्वप्रथम गंगापुत्र भीष्म जैसा सेनापति पाकर वो निश्चिंत हो गया। उन्हें भला युद्ध में कौन हरा सकता था? किन्तु दैवयोग से उनका भी पराभव हुआ। यही गलती उसने गुरु द्रोण और अंगराज कर्ण जैसे सेनापति को पाकर की। अगर वो युद्ध में पहले ही उतरा होता तो कदाचित वो रणभूमि का हाल और अच्छे से जान पता और उसकी पकड़ युद्ध पर और भी कड़ी होती।

दुर्योधन को इस प्रकार बोलते देख श्रीकृष्ण ने कहा – “हे दुर्योधन! तुम्हारी ये तीन गलतियाँ कदाचित युद्ध के परिणाम के लिए निर्णायक हुई किन्तु तुम्हारी पराजय तभी से आरम्भ हो गयी थी जब तुमने भरी सभा में कुलवधू द्रौपदी का अपमान किया था। अतः वीर, ये प्रलाप छोड़ो और शांत मन से स्वर्ग की ओर प्रस्थान करो।”

श्रीकृष्ण का पूर्वजन्म

श्रीकृष्ण का पूर्वजन्म
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जब कंस ने ये सुना कि उसकी बहन देवकी की आठवीं संतान ही उसका वध करेगी तब उसने उसे मारने का निश्चय किया। बाद में इस शर्त पर कि देवकी और वसुदेव अपनी सभी संतानों को जन्म लेते ही उसके हवाले कर देगी, उसने दोनों के प्राण नहीं लिए किन्तु दोनों को कारागार में डाल दिया। एक-एक कर कंस ने दोनों के सात संतानों का वध कर दिया। अब आठवीं संतान के रूप में श्रीहरि विष्णु देवकी के गर्भ से जन्म लेने वाले थे। अपने अन्य पुत्रों के वध से दुखी देवकी और वसुदेव अत्यंत दीन अवस्था में भगवान विष्णु के तप में बैठे। उनके मन में केवल यही प्रश्न था कि आखिर किस पाप का दण्ड उन्हें मिल रहा है? साथ ही ये भी कि क्या उनका आठवाँ पुत्र भी उस दुष्ट कंस के हाथों मारा जाएगा? इस प्रकार भगवान विष्णु के तप में बैठे-बैठे उन्हें कई मास बीत गए और देवकी के प्रसव का समय आ गया। जिस रात परमावतार श्रीकृष्ण का जन्म होने वाला था, उनकी पीड़ा और तप देख कर स्वयं भगवान नारायण उनके समक्ष प्रकट हुए। त्रिलोकीनाथ को अपने समक्ष देख दोनों उनके चरणों में गिर पड़े। दोनों के अश्रुओं से भगवान के चरण भींगने लगे। देवकी ने उनके चरणों पर सर रखते हुए कहा – “हे नाथ! आप तो सर्वज्ञ हैं। इस कंस के अत्याचार से संसार को मुक्त क्यों नहीं करवाते? उस पापी को मारने के लिए तो आपकी इच्छा मात्र ही पर्याप्त है। फिर किस कारण आप अपने भक्तों की इतनी कठिन परीक्षा ले रहे हैं? ऐसा कौन सा अपराध हमसे हुआ है जिस कारण हमें आप इतना कठिन दण्ड दे रहे हैं?”

भगवान ने मुस्कुराते हुए दोनों को उठाया और कहा – “वत्स! इतने ज्ञानी होते हुए भी तुम अज्ञानियों की तरह क्यों बात कर रहे हो? क्या तुम्हे नहीं पता कि भगवान ब्रह्मा के विधान के अनुसार ही सभी प्राणी अपने जीवन में सुख अथवा दुःख भोगते हैं। हाँ ये सत्य है कि हमारे केवल संकल्प मात्र से इस पृथ्वी से पापिओं का नाश हो सकता है किन्तु अगर त्रिदेव स्वयं अपने ही बनाये विधान का उलंघन करेंगे तो मनुष्य किसका अनुगमन करेगा? अपने अन्य पुत्रों की मृत्यु का संताप ना करो। वे तो जन्म लेते ही इस जन्म और मरण के चक्र से छूट कर मेरे पास पहुँच चुके हैं। और फिर दुःख किस बात का जब मैं स्वयं तुम्हारे पुत्र के रूप में जन्म ले रहा हूँ।”

ये सुनते ही दोनों की प्रसन्नता का ठिकाना ना रहा। उन्हें इस बात का विश्वास नहीं हुआ कि उन्हें भगवान विष्णु के माता पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त होगा। उन्होंने अवरुद्ध कंठ से पूछ – “क्या ये सत्य है प्रभु?”

तब भगवान ने कहा – “मेरा वचन कभी असत्य नहीं होता। अगर तुम्हारी जानने की इच्छा हो तो सुनो। आज मैं तीसरी बार तुम्हारे गर्भ से जन्म लूँगा। देवी, स्वायम्भुव मन्वन्तर में तुम्हारा नाम “पृश्नि” और वसुदेव “सुतपा” नाम के प्रजापति थे। तुम दोनों ने १२००० वर्षों तक कठिन तप करके मुझे प्रसन्न किया। जब मैंने तुमसे वर माँगने को कहा तो तुमने मेरे समान पुत्र की कामना की। उस समय मैं “पृश्निगर्भ” के नाम से तुम दोनों का पुत्र हुआ। फिर दूसरे जन्म में तुम “अदिति” और वसुदेव “कश्यप” हुए। उस समय भी मैं तुम्हारा पुत्र हुआ और मेरा नाम था “उपेन्द्र”। शरीर छोटा होने के कारण लोग मुझे “वामन” भी कहते थे। तुम्हारे इस तीसरे जन्म में भी मैं उसी रूप में “कृष्ण” के नाम से पुनः तुम्हारे पुत्र के रूप में जन्म लूँगा। मेरा ये रूप पिछले सभी रूपों से श्रेष्ठ होगा और केवल तुम्हारा ही नहीं अपितु संसार के सभी मनुष्यों के कष्ट को करने वाला होगा।” ये कहकर भगवान नारायण दोनों को आशीर्वाद देकर अंतर्धान हो गए।

इस प्रकार श्रीहरि के समझने पर देवकी और वासुदेव का दुःख समाप्त हो गए और उन्हें विश्वास हुआ कि कंस का अत्याचार अब केवल कुछ समय के लिए ही बचा है। उसी रात नारायण के कथन अनुसार देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ।

जय श्रीकृष्ण।